क्या चंदन की खेती से करोड़ों की कमाई संभव है?

Chandan Ki Kheti Se Kaise Banen Crorepati Indo Essence Agro & Herbs

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चंदन की खेती के नियम

चंदन की खेती को लेकर अधिकांश किसानों में संशय है जैसे.  क्या सरकार द्वारा इस खेती की अनुमति है? क्या बेचना कानूनी है? हम कैसे बेचेंगे? और इस फसल को उगाने के लिए कौन मार्गदर्शन करेगा?

हम यहां पर उन सब प्रश्नों के उत्तर देने की कोशिश करेंगे।

देश में साल 2000 से पहले आम लोगों को चंदन को उगाने और काटने की मनाही थी। सात 2000 के बाद सरकार ने अब चंदन की खेती को आसान बना दिया है। अगर कोई किसान चंदन की खेती करना चाहता है तो इसके लिए वह वन विभाग से संपर्क कर सकता है। चंदन की खेती के लिए किसी भी तरह के लाइसेंस की जरूरत नहीं होती है। केवल पेड़ की कटाई के समय वन विभाग से  नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेना होता है जो आसानी से मिल जाता है।

चंदन की लकड़ी का उपयोग:

चंदन का इस्तेमाल ना केवल हमारे धार्मिक कामों में आता है बल्कि कई तरह के सौंदर्य और मेडिकल प्रोडक्ट भी बनाए जाते हैं. चंदन की लकड़ी से खुशबू के अलावा औषधीय महत्व भी है. इसके तेल से मालिश करने से मांसपेशियों की ऐठन दूर होती है, और इसका तेल मस्तिष्क के कोशिकाओं को उत्तेजित करदिमाग और याददाश्त तेज़ करता है. इसका तेल का दवाओं के अलावा धूपबत्ती, अगरबत्ती, साबुन, परफ्यूम आदि में प्रयोग किया जाता है

प्रजातियां :

पूरे विश्व में चंदन की 16 प्रजातियां है। जिसमें सेंलम एल्बम प्रजातियां सबसे सुगंधित और औषधीय मानी जाती है। इसके अलावा लाल चंदन, सफेद चंदन, सेंडल, अबेयाद, श्रीखंड, सुखद संडालो प्रजाति की चंदन पाई जाती है।

चंदन की खेती के लिए जलवायु :

चंदन पौधों को उगाने के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु की आवश्यकता होती है. चंदन की खेती 500 से 600 मिमी वार्षिक वाले क्षेत्रों में आसानी से होती है. इसकी खेती के लिए 12°C से 35 °C तापमान वाले क्षेत्र उचित हैं. इसकी खेती बर्फीले और रेगिस्तान वाले इलाकों को छोड़ा लगभग सभी जगहों पर की जा सकती है.

चंदन की खेती के लिए काली मिट्टी, लाल चिकनी मिट्टी जिसमें जल निकासी अच्छी हो उपयुक्त रहती है.

जिन जमीनों की पीएच वैल्यू 4-6 तक है उनकी भूमि में लाल चंदन अच्छी ग्रोथ करता है, इस तरह की भूमि दक्षिण भारत और भारत के पूर्वी भाग में मिलती है। उत्तरी भारत के लिए सफेद चंदन उपयुक्त रहता है, क्यों सफेद चंदन के लिए भूमि का पीएच मान 6.5 ~ 8.5 उन्नत होता है और उत्तर भारत में अधिकार याहि पीएच पाया जाता है। पूर्वी भारत में दो प्रकोप के चंदन का सही विकास होता है।

चंदन की खेती के लिए बेहतर समय :

हालाँकि इसे अत्यधिक ठंड को छोड़कर पूरे वर्ष लगाया जा सकता है फिर भी अप्रैल और मई का महीना चंदन की बुवाई के लिए सबसे अच्छा होता है।

पौधे बोने से पहले 2 से 3 बार अच्छी और गहरी जुताई करना जरूरी होता है। जुताई होने के बाद 2x2x2 फीट का गहरा गड्ढ़ा खोदकर उसे कुछ दिनों के लिए सूखने के लिए छोड़ देना चाहिए।

चंदन के पेड़ को 5 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले इलाके में लगाना सही माना जाता है। एक एकड़ भूमि में औसतन 400 पेड़ लगाए जाते हैं। इसकी खेती के लिए 500 से 625 मिमी वार्षिक औसम बारिश की आवश्यकता होती है। 

चंदन की खेती में पौधरोपण

चंदन का पौधा अद्र्धजीवी होता है। इस कारण चंदन का पेड़ आधा जीवन अपनी जरुरत खुद पूरी करता है और आधी जरूरत के लिए दूसरे पेड़ की जड़ों पर निर्भर रहता है। इसलिए  चंदन का पेड़ अकेले नहीं पनपता है। अगर चंदन का पेड़ अकेला लगाया जाएगा तो यह सूख जाएगा। जब भी चंदन का पेड़ लगाएं तो उसके साथ दूसरे पेड़ भी लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि चंदन के कुछ खास पौधे जैसे बबूल, करंजी,शूरु, देसी नीम लगाने चाहिए जिससे उसका विकास हो सके। 

इन सभी पोधों की पौधरोपण योजना ठीक से होनी चाहिए। सामान्य तौर पर 15×15 या 15×20 फीट पर चांद के पौधे लगते हैं और पंक्ति में समान दुरी पर एक शुरू या बबूल और एक देसी नीम या करंजी लगा सकते हैं।

और हम आपको अब एक और महत्वपूर्ण बात बताना चाहते हैं कि आपको चंदन के पौधे के पास कुछ लाल मेहंदी लगानी चाहिए ~ 2 साल तक आपको रखनी होती है।

चंदन की खेती में खाद प्रबंधन:

चंदन की खेती में जैविक खादकी अधिक आवश्यकता नहीं होती है। शुरू में फसल की वृद्धि के समय खाद की जरुरत पड़ती है। लाल मिट्टी के 2 भाग, खाद के 1 भाग और बालू के 1 भाग को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। गाद भी पौधों को बहुत अच्छा पोषण प्रदान करता है।

चंदन की खेती में सिंचाई :

 सिंचाई मिट्टी में नमी और मौसम पर निर्भर करती है। इस पौधे को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं है! इसलिए कम पानी देना चाहिए ! आप पानी साप्ताहिक या १५ दिनों के अंतराल पर दे सकते हैं! इस पौधे के लिए जलजमाव खतरनाक है।

चंदन की खेती में खरपतवार

चंदन की खेती करते समय, चंदन के पौधे को पहले साल में सबसे अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है। पहले साल में पौधों के इर्द-गिर्द की खरपतवारको हटाना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो दूसरे साल भी साफ-सफाई करनी चाहिए। किसी भी तरह का पर्वतारोही या जंगली छोटा कोमला पौधा हो तो उसे भी हटा देना चाहिए। रसायनों के इस्तेमाल से पौधे की बढ़वार पर विपरीत असर पड़ता है.

चंदन की खेती में कीट एवं रोग नियंत्रण

चंदन की खेती में सैंडल स्पाइक नाम का रोग चंदन के पेड़ का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। इस रोग के लगने से चंदन के पेड़ सभी पत्ते ऐंठाकर छोटे हो जाते हैं। साथ ही पेड़ टेड़े-मेढ़े हो जाते हैं। इस रोग से बचाव के लिए चंदन के पेड़ से 5 से 7 फीट की दूरी पर एक नीम का पौधा लगा सकते हैं जिससे कई तरह के कीट-पंतगों से चंदन के पेड़ की सुरक्षा हो सकेगी। चंदन के 3 पेड़ के बाद एक नीम का पौधा लगाना भी कीट प्रबंधन का बेहतर प्रयोग है

कीटों की रोकथाम के लिए नीम की खली या बुवेरिया बेसियाना या मेटारिजियम जैसे जैविक उत्पाद का गोबर की खाद के साथ उपयोग किया जा सकता है. रोग नियंत्रण के लिए ट्राइकोडर्मा जैविक फफूंदनाशी का उपयोग कर सकते हैं.

 चंदन की फसल की कटाई

चंदन का पेड़ जब 15 साल का हो जाता है तब इसकी लकड़ी प्राप्त की जाती है। चंदन के पेड़ की जड़े बहुत खुशबूदार होती है। इसलिए इसके पेड़ को काटने की बजाय जड़ सहित उखाड़ लिया जाता है। पौधे को रोपने के पांच साल बाद से चंदन की रसदार लकड़ी बनना शुरू हो जाता है। चंदन के पेड़ को काटने पर उसे दो भाग निकलते हैं। एक रसदार लकड़ी होती है और दूसरी सूखी लकड़ी होती है। दोनों ही लकडिय़ों का मूल्य अलग-अलग होता है।

चंदन की खेती में लागत और लाभ :

देश में चंदन की मांग इतनी है कि इसकी पूर्ति नहीं की जा सकती है। देश में चंदन की मांग 300 प्रतिशत है जबकि आपूर्ति मात्र 30 प्रतिशत है। वर्तमान में मैसूर की चंदन लडक़ी के भाव 25 हजार रुपए प्रति किलो के आसपास है। इसके अलावा बाजार में कई कंपनियां चंदन की लडक़ी को 10 हजार से 15 हजार रुपए किलो के भाव से बेच रही है। एक परिपक्व (10-12 साल) चंदन के पेड़ से 10-15 किलो लकड़ी प्राप्त की जा सकती है और एक किलो चंदन की कीमत 10-12 हजार तक हो सकती है. इसलिए एक एकड़ में यदि 300 पेड़ भी लगाए तो एक एकड़ खेत से करीब 3 करोड़ रुपए कमाए जा सकते हैं. यह किसी भी बैंक में एफडी और प्रॉपर्टी में निवेश से भी कई गुना ज्यादा आपको लाभ दे सकता है।

विशेष सलाह:

किसानो को सलाह दी जाती है की चंदन जैसी मुल्यवान  एवम दीर्घकलिक फसल को लगाने से पूर्व सही और पक्का जानकरी प्रप्त कर लेवे और विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही प्लांटेशन करें। और पौधों को अच्छी नर्सरी से ही खरीदे!

हमारी संस्था किसानो को उच्च गुणवत्ता के पौधे उपलब्ध करने से लेकर, संपूर्ण वैज्ञानिक विधि से उसकी खेती कराने मे किसानो की सहायता करती है। साथ ही विपणन में भी सहायता करती है। नीचे दी गयी लिंक पर क्लिक करके इस संबंध मे आप अपने प्रश्न भी पूछ सकते है।

इस फसल के बारे में अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें हमारे विशेषज्ञ जल्द ही आपसे संपर्क करेंगे

महोगनी की खेती को अपनाकर कैसे करें भविष्य सुरक्षित

 

महोगनी वृक्ष

  महोगनी एक तरह का पर्णपाती वृक्ष है और दक्षिण अमेरिका और डोमिनिकन गणराज्य का राष्ट्रीय वृक्ष है.

यह अफ्रीका और अमेरिका में पाया जाने वाला पौधा हे जिसकी लकड़ियों से लेकर पत्तियां और फल सभी की देश और दुनिआ में भारी मांग है।

महोगनी  की ऊंचाई लगभग 50~70 फिट तक होती है और इसकी मोटाई 2 से 2.5  फिट तक होती है। वृक्ष परिपक्वता समय 10 से 12 वर्ष है!

इसके महत्त्व को देखते हुवे अमरीका में 1990 में महोगनी के  निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। 

अमेरिका के इस प्रतिबन्ध के बाद भारत, बांग्लादेश, इण्डोनेशिआ जैसे देशों में महोगनी  की खेती की जाने लगी।

महोगनी का उपयोग

हमारे वेदों में महोगनी को महागुणी के नाम से भी जानते है। महागुणी नाम इसलिए क्यों की इसके गुणों की कोई संख्या नहीं है। महोगनी से मिलने वाली बेशकीमती  लकड़ी न टूटती  है न सड़ती है । 

महोगनी की लकड़ी मजबूत और काफी लंबे समय तक उपयोग में लाई जाने वाली लकड़ी होती है. यह लकड़ी लाल और भूरे रंग की होती है. इस पर पानी  का कोई असर नहीं होता है. महोगनी लकड़ी का उपयोग  महंगे फर्नीचर, नाव, पानी के बड़े बड़े जहाज, बन्दुक , खेल का सामान, भूकंप रोधी मकान और महंगे नकाशीदार खिलोने बनाने में किया जाता है।

महोगनी पत्तियों का उपयोग:

इसके पत्तों का उपयोग मुख्य रूप से रक्तचाप, कैंसर, अस्थमा और मधुमेह सहित कई प्रकार के रोगों में होता है. महोगनी की पत्तियों से मच्छर दूर भागते है। इसी गुण से इसकी पत्तियों से विभिन्न मच्चर भागने वाले तेल और mosquito coil बनाने में उपयोग किया जाता है। महोगनी के पत्तों को वायरल फीवर में खाया जाए तो यह फीवर को ख़त्म कर देता है। 

महोगनी पत्तियों का उपयोग कीटनाशक बनाने में और खाद बनाने में किया जाता है। 

महोगनी के फल का उपयोग:

महोगनी के फल एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते है, ये नाशपाती के आकार के होते है।  यह फल आम तौर पर मार्च महीने के आसपास आते है। देखने में ये हलके भूरे रंग के चीकू जैसे  होते है। यह फल कैप्सूल के आकर के बीजों से भरे होते है। इस फलों को सीधे तौर पे खाया नहीं जाता मगर महोगिनी के फलों का उपयोग औषधि बनाने में किया जाता है। 

 यह  फल  मुक्तकणों से लड़ना, रक्त परवाह में वसा को कम करना, कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करना, और प्रतिरक्षा प्रणाली में वृद्धि करना  जैसा कार्य  करते  है।  5 साल में एक बार इसके फल अप्रैल- जून में लगते है। इसके बीज का उपयोग भी कई प्रकार की औषधि बनाने में किया जाता है।

प्रति एकड़ वृक्षारोपण गणना:

1 एकड़ में अगर महोगनी के पेड़ लगाया  जाये तो 6-8 फुट के अंतर पर इसे लगा सकते है। इस हिसाब से 1 एकड़ में इस 680-1210 पौधे लगा सकते है।

सबसे अच्छी बात यह है कि आप अपने मुख्य खेत को प्रभावित किए बिना अपने खेत की सीमा पर वृक्षारोपण कर सकते हैं।

अनुकुल मिट्टी और जलवायु;

 महोगनी  के पौधे को बर्फीले प्रदेश को छोड़कर सभी प्रकार की मिट्टी में बिना किसी परेशानी के बढ़ता है। महोगनी के पौधे को यदि लगाना हो तब 1-2 साल तक ही इसको देख भाल की ज़रूरत होती है। 

किसी भी प्रकार की मिट्टी में आसानी से विकास कर लेता है। लेकिन पौधों के लिए जलभराव हानिकारक हो सकता है! जब तक कि यह अपनी जड़ें जमीन से पकड़ ना लें तब तक मिटटी में नमी बरक़रार रखने की ज़रूरत होती है। 

आय गणना:

एक परिपक्व पेड़ (10-12 साल बाद) आपको 25,000 से 40,000 रुपये का कुल मूल्य दे सकता है। यदि आपने 1000 पौधे लगाए तो कुल कमाई कम से कम 2.5 करोड़ हो सकती है, और यदि आप अच्छा खरीदार ढूंढ़ते हैं तो आपको इसका मूल्य  और अधिक मिल सकता है।

इसके अलावा, प्रत्येक पेड़ प्रत्येक 5 साल के बाद 5 किलो बीज देता है, 1000 पेड़ 5000 किलो बीज देगा, बीज की वर्तमान बाजार दर 800 ~ 1200 रुपये प्रति किलो है, न्यूनतम मूल्य 4 लाख (5 वें वर्ष पर) होगा। समान मात्रा और समान मूल्य 10 वें वर्ष में भी पाया जा सकता है।


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ड्रमस्टिक (सहजन) की खेती में सुरक्षित करियर कैसे बनाया जाए!

ड्रम स्टिक (सहजन) क्या है ?

सहजन को मुनगा, मोरिंगा  या सुरजना  के नाम से जाना जाता है । इसका वनस्पतिक नाम मोरिंगा ओलीफेरा (Moringa oleifera) है। इसकी ख़ासियत एक बड़ी ख़ासियत यह भी है कि यह कमजोर जमीन पर भी बग़ैर सिंचाई व देखभाल के सालों भर हरा-भरा रहता है

सहजन या मुनगा केपौधे के सभी भागों, फल,फूल,पत्ती, का प्रयोग भोजन,दवा औद्योगिक कार्यो आदि में किया जाता है। मुनगा या मोरिंगा में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व व विटामिन है। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक सर्वे के अनुसार सहजन में दूध की तुलना में चार गुना पोटेशियम,संतरा की तुलना में सात गुना विटामिन सी पायी जाती है। इसके साथ सहजन औषधीय गुणों से भरपूर है।देश की कई आयुर्वेदिक कम्पनियाँ जैसे ayur, patanjali, संजीवन हर्बल कम्पनी सहजन से दवा बनाकर (पाउडर, कैप्सूल, तेल बीज आदि) विदेशों में निर्यात कर विदेशी मुद्रा अर्जित कर रहे हैं ।

मिट्टी

सहजन की खेती की सभी प्रकार की मिट्टियों में जा सकती है। बेकार, बंजर और कम उर्वरा भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है, किंतु व्यवसायिक खेती के रूप में, जहाँ पर साल में दो बार फलनेवाला सहजन के प्रभेदों के उद्देश्य से मुनगे की खेती की जाती है। वहाँ पर सहजन की खेती के लिए मिट्टी का चयन 6-7.5 पी.एच. मान वाली बलुई दोमट मिट्टी करें।

जलवायु

 कम या ज्यादा वर्षा से पौधे को कोई नुकसान नहीं होता है।सहजन की खेती को पाला से नुकसान होता है। सामान्यतया 25-300 के औसत तापमान पर सहजन के पौधा का हरा-भरा व काफी फैलने वाला विकास होता है। 

सहजन की क़िस्में

ODC

पी.के.एम.1,

पी.के.एम.2,

कोयेंबटूर 1

कोयेंबटूर 2

ज्योति -1

ODC एक प्रसिद्ध किस्म है जिसे पूरे भारत में व्यापक रूप से उगाया जा रहा है और हाल ही में इसकी उपज और स्वाद और उपभोक्ता वरीयता के लिए ड्रमस्टिक किसानों के बीच बहुत प्रशंसा और जागरूकता प्राप्त कर रहा है

ODC विशेषताएं:

ODC विशेषताएं:

1. फल स्वादिष्ट होते हैं।

2. यह बुवाई के 3-4 महीने के भीतर फूल आता है और 6 महीने में कटाई होती है।

3. पौधे एक वर्ष में 8 – 10 फीट की ऊँचाई तक बढ़ते हैं और 6-10 प्राथमिक शाखाएँ बनाते हैं।

4. फूल 50 – 200 / क्लस्टर के समूहों में होते हैं, केवल एक फली आमतौर पर विकसित होती है और शायद ही कभी 3-5 प्रति क्लस्टर विकसित होती है।

5. फली 2 फीट से 2.5 फीट लंबी होती है,

6. किस्म की औसत उपज 300 फल / वृक्ष हैं।

7. अनुमानित उपज प्रति वर्ष लगभग 25 -30 टन प्रति एकड़ है

खेत की तैयारी :

सहजन के पौध की रोपनी में गड्ढा बनाकर किया जाता है। सहजन की खेती (sahjan  kheti) खेत को अच्छी तरह खरपतवार से साफ़-सफाई का 2.5 x 2.5 मीटर की दूरी पर 45 x 45 x 45 सेंमी. आकार का गड्ढा बनाते हैं। गड्ढे के उपरी मिट्टी के साथ 10 किलोग्राम सड़ा हुआ गोबर का खाद मिलाकर गड्ढे को भर देते हैं। इससे खेत पौध के रोपनी हेतु तैयार हो जाता है।

खाद व उर्वरक–

मुनगे या सहजन की रोपाई के एक महीने के बाद 100 ग्राम यूरिया + 100 ग्राम सुपर फास्फेट + 50 ग्राम पोटाश प्रति गड्ढा की दर से डालें । तथा इसके तीन महीने बाद 100 ग्राम यूरिया प्रति गड्ढा का उर्वरक दें । वैज्ञानिकों द्वारा सहजन पर किए गए शोध से यह पाया गया कि मात्र 15 किलोग्राम गोबर की खाद प्रति गड्ढा तथा एजोसपिरिलम और पी.एस.बी. (5 किलोग्राम/हेक्टेयर) के प्रयोग से जैविक सहजन की खेती अच्छी उपज ली जा सकती है।

यदि आपने रूसी उत्पाद “Organix” का उपयोग किया है, तो अधिक यूरिया देने की आवश्यकता नहीं है, और आप पौधे बड़े पैमाने पर विकसित करेंगे।

सिंचाई व खरपतवार रोकथाम

सहजन की खेती (sahjan  kheti) से अच्छी उपज लेने हेतु सिंचाई करना बहुत ज़रूरी है। सहजन के पौध में सामान्य जल माँग होती है। बीजों के अंकुरण के समय नमी का होना बेहद ज़रूरी है। इसके अलावा पौधों में फूल लगते समय मिट्टी न अधिक शुष्क हो और ना भी अधिक नमी। अधिक नमी या सूखा होने से फूल झड़ जाते हैं।

वैसे तो मुनगे में खरपतवार की देखभाल की आवश्यकता नही होती है। फिर भी मुनगे के पेड़ के आस पास उगे खरपतवार निराई कर हटा देना चाहिए। पौधे के जड़ों में मिट्टी भी चढ़ा देना चाहिए।

पौध सुरक्षा –

भुआ पिल्लू कीट –

सहजन पर लगने वाले इस कीट के प्रति गम्भीर रहे। क्योंकि यह सम्पूर्ण पौधे की पत्तियों को खा जाता है इसके साथ आसपास में भी फ़ैल जाता है। अंडा से निकलने के बाद अपने नवजात अवस्था में यह कीट समूह में एक स्थान पर रहता हैं बाद में भोजन की तलाश में यह सम्पूर्ण पौधों पर बिखर जाता है।

रोकथाम –

इसके नियंत्रण के लिए सरल और देशज उपाय यह है कि कीट के नवजात अवस्था में सर्फ को घोलकर अगर इसके ऊपर डाल दिया जाय तो सभी कीट मर जाते हैं। वयस्क अवस्था में जब यह सम्पूर्ण पौधों पर फ़ैल जाता है तो एकमात्र दवा डाइक्लोरोवास (नूभान) 0.5 मिली. एक लीटर पानी में घोलकर पौधों पर छिड़काव करने से तत्काल लाभ मिलता है।

फल मक्खी  –

सहजन के पौधे पर फल पर इस कीट का कभी-कभी हमला होता है ।

रोकथाम –

इस कीट के नियंत्रण हेतु भी डाइक्लोरोवास (नूभान) 0.5 मिली. दवा एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने पर कीट का नियंत्रण होता है।

उपज

प्रत्येक पौधे से लगभग 200-400 (40-50 किलोग्राम) सहजन सालभर में प्राप्त हो जाता है।

लाइन से लाइन की दूरी 10 फिट और प्लांट से प्लांट की दूरी 8 फिट रखी जाती है, एक एकड़ खेत में 544 पौधे लगाए जाते हैं। यदि एक पौधा 40 किलोग्राम देता है, तो 544 पौधे 21,760 किलोग्राम उत्पादन देंगे, यदि पूरी बिक्री का मूल्य 30 रुपये प्रति किलोग्राम है तो कुल अर्जित धन 6,52,800 होगा।

इसके अलावा अगर आप  पत्तियों  को बेच पाते हैं तो  पत्तियों  से भी कमाई हो सकती है। वर्तमान में सूखी मोरिंगा पत्तियों की थोक कीमत 30-40 रुपये प्रति किलोग्राम है। एक पौधा प्रति वर्ष 4-5 किलोग्राम पत्तियां देता है, अगर हम एकल पौधे से 2.5 किलो सूखे पत्ते मानते हैं, तो 544 पौधा 1360 किलोग्राम पत्तियों देगा, जिसकी कीमत लगभग 40,800 रुपये होगी।

सोयाबीन की नई वेरायटी MACS 1407, 1 Hectare में मिलेगी 39 क्विंटल उपज!

भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसे सोयाबीन की वेरायटी तैयार की है जो बंपर उपज देने के साथ कीटों के प्रभाव से बेअसर है. इन नए बीज से किसानों को उत्पादन ज्यादा मिलेगा क्योंकि कीटों का प्रभाव नहीं होने से फसल पुष्ट और सेहतमंद होगी. अगले सीजन से किसानों को इसका बीज मिलना शुरू हो जाएगा.

सोयाबीन की इस नई वेरायटी का नाम एमएसीएस 1407 है. यह नई वेरायटी मुख्य रूप से असम, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तर पूर्वी राज्यों की माटी के लिए उपयुक्त होगी. ऐसे तो सभी राज्यों में इसे उगाया जा सकता है लेकिन इन राज्यों की मिट्टी में इसकी उपज ज्यादा होने की संभावना है. रिसर्च में यह बात सामने आई है.

कहां तैयार हुई नई वेरायटी

सोयाबीन की यह नई वेरायटी एमएसीएस (MACS) को पुणे स्थित अघरकर रिसर्च इंस्टीट्यूट ने तैयार किया है. यह रिसर्च इंस्टीट्यूट भारत सरकार के अंतर्गत आने वाले डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की स्वायत्त संस्था है. यह संस्थान इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (ICAR) के तहत काम करता है. इस नई वेरायटी के बारे में केंद्रीय कृषि मंत्रालय की तरफ से भी जानकारी दी गई है. एक बयान में कहा गया है कि नई वेरायटी के बीच 2022 के खरीफ सीजन में किसानों को उपलब्ध हो सकेंगे.

कैसे तैयार किया नया बीज

सोयाबीन की यह नई वेरायटी क्रॉस ब्रीडिंग टेक्नोलॉजी से तैयार की गई है. इस नई वेरायटी से प्रति हेक्टेयर 39 क्विंटल तक सोयाबीन का उत्पादन मिल सकेगा. सबसे बड़ी बात है कि बंपर पैदावार देने के साथ यह वेरायटी खतरनाक कीटों जैसे गर्डल बीटल, लीफ माइनर, लीफ रोलर, स्टेम फ्लाई, एफिड्स, व्हाइट फ्लाई और डिफोलिएटर्स से बेअसर है.

कैसा होगा पौधा

इसके पौधे की जड़ जमीन से बस 7 सेमी नीचे तक होगी. इससे उपज निकालने में कोई दिक्कत नहीं होगी और यह काम हाथ से भी आसानी से किया जा सकेगा. देश के उत्तर पूर्वी भागों में अच्छी बारिश होती है और वहां पानी की कमी नहीं होती. ऐसे इलाकों के लिए नई वेरायटी उपयुक्त मानी जा रही है. इस वेरायटी को तैयार में लगे एआरआई के वैज्ञानिक संतोष जयभय ने ‘PTI’ से कहा कि अगर अच्छी खेती की जाए, मौसम अनुकूल हो तो 17 परसेंट तक ज्यादा उत्पादन पाया जा सकता है. अगर इसमें थोड़ी कमी हो तो यह उत्पादन 14 परसेंट तक जा सकता है.

कब होगी खेती

इस नई वेरायटी की खेती 20 जून से 5 जुलाई तक कर देनी होगी और इससे कोई उपज की हानि नहीं होगी. अगर इस अवधि में बुवाई कर दें तो मॉनसून का प्रतिकूल प्रभाव देखने को नहीं मिलेगा. नई वेरायटी ‘MACS 1407’ बुवाई के बाद फूल देने तक 43 दिन का समय लेता है, जबकि फसल पकने में बुवाई से कुल 104 दिन का समय लगता है. फूल सफेद होता है, बीज पीला होता है तना काले रंग की होती है. इसके बीज में 20 परसेंट तक तेल, 41 परसेंट प्रोटीन पाया जाता है. इसका बीज जल्द अंकुरित भी हो जाता है.

पिंक ताइवान अमरूद की खेती क्यों करें !

हम आपको पिंक ताइवान अमरूद के बारे में बताने जा रहे हैं जो कि भारत में बहुत ही लोकप्रिय हो रहा है और यह किसानों का कमाने का अच्छा जरिया भी बन रहा है इस  की  खेती करके किसान अच्छी उपाधि प्राप्त कर सकते हैं और अच्छा लाभ प्राप्त कर सकते हैं ।

यह वैरायटी अपने   ज्यादा  उपज और अच्छे स्वाद के लिए जानी जाती है

 पिंक ताइवान अमरूद एक बारहमासी होती है जो लगभग 1 साल में तीन बार तक फल देती है ,  हम  यह  भी कह सकते हैं कि लगभग साल भर ही इसमें रहते हैं। एक पेड़ में 1 साल  में लगभग 20 से 25 किलो फल होते हैं यदि आप एक एकड़ में इसकी खेती करना चाहें तो लगभग 1000 पौधा लगा सकते  हैं, यह हाई डेंसिटी में भी(कम दूरी पर भी) लगाया जा सकता है।

 इसमें 1 फुट की ऊंचाई पर ही  फल आने लगते हैं  और फल का बजन लगभग 400 ग्राम से लेकर 1200 ग्राम तक जा सकता है भाग इसका पिंक कलर का होता है, जोकि बहुत सॉफ्ट होता है वह खाने में बड़ा ही स्वादिष्ट  होता  है।  यह पौधा  लगभग 7 महीने के बाद ही फल देने लगता है।

 उपयुक्त मिट्टी

 इस पौधे के लिए उपयुक्त पीएच मान 4.5 से 7.0 तक उचित होता है इस तरह से हम देख सकते हैं कि लगभग सभी प्रकार की मृदा ओं में यह अच्छी तरह से लगाया जा सकता है ।। फिर भी उचित होगा कि किसान अपने मिट्टी टेस्ट कराएं और अपने भूमि का पीएच मान ज्ञात करें,  यदि  पीएच मान को कम या ज्यादा करना है तो उसके हिसाब से मिट्टी को उपचार किया जा सके।

खेत की तैयारी

रोपण से पहले 40x40x40 सेमी या 60x60x60 सेमी 1 से 2 महीने के किनारे रोपण के लिए  गड्ढे तैयार करना  चाहिए, प्रत्येक गड्ढे  में 5 से 10 किलोग्राम जैविक  खाद, मिट्टी के साथ गड्ढों  में जमीन के स्तर तक पौधे  लगाते समय  भर देना  चाहिए।  देते समय  उचित होगा कि अच्छी क्वालिटी का प्लांट ग्रोथ प्रमोटर भी उस में डाल दिया जाए जिससे  पौधे की ग्रोथ फास्ट होगी।

 देख रेख

 हालांकि इसमें फल  तो सात आठ महीने के लगभग से आना शुरू हो जाते हैं लेकिन फिर भी सलाह दी जाती है कि लगभग 12 महीने तक इसकी फसल ना लेकर इसके पौधे के विकास पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए और समय रहते हुए कटिंग करते रहना चाहिए पौधे की हाइट को ज्यादा ना बढ़ाते हुए पौधे को गोलाई में बढ़ाने के लिए के हिसाब से कटिंग करनी चाहिए।  इसके  अलावा यदि ज्यादा मात्रा में फल लगते हो तो उनको तोड़ कर अलग हटा देना चाहिए ताकि डालियों पर ज्यादा दबाव वजन ना हो । 

 कीट प्रबंधन 

 एक कठोर पौधा हार्ड प्लांट होता है , इसमें कीट कम ही लगते हैं,  लेकिन शुरुआती अवस्था में कुछ आप बायोफंगींसाइड का उपयोग कर सकते हैं बाकी 1 साल के बाद किसी तरह के रोग नहीं लगते ! इसके लिए आपको ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं होती  है।। फिर भी यदि किसी तरह का  कीट प्रकोप आपको नजर आए तो विशेषज्ञ से संपर्क करना  चाहिए।

 आर्थिक गणना।

 1 साल बाद एक पौधे से कम से कम 20 किलो से 30 किलो के बीच उपज प्राप्त की जा सकती है मान लें कि 1000 पौधे   आपने अपने खेत में लगाए हैं तो टोटल उत्पादन हुआ 20,000  Kg ,अब  मिनिमम 30 / प्रति किलो भी  मान  लिया जाए तो एक सीजन में  लगभग 6,00,000 रुपए का शुद्ध  मुनाफा  होता है और यदि 1 साल की बात करें तो यह 10,00,000  से  12,000,00 तक हो सकता है।













STRAWBERRY FARMING GUIDE

स्ट्राबेरी की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

स्ट्रॉबेरी फ़्रागार्या जाति का एक पेड़ होता है, जिसके फल के लिये इसकी विश्वव्यापी खेती की जाती है। इसके फल को भी इसी नाम से जाना जाता है। स्ट्रॉबेरी की विशेष गन्ध इसकी पहचान बन गयी है। ये चटक लाल रंग की होती है। इसे ताजा भी, फल के रूप में खाया जाता है, साथ ही इसे संरक्षित कर जैम, रस, पाइ, आइसक्रीम, मिल्क-शेक आदि के रूप में भी इसका सेवन किया जाता है।

इन फलों में विटामिन- सी तथा लौह तत्व प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं| यह अपने विशेष स्वाद एवं रंग के साथ-साथ औषधीय गुणों के कारण भी एक महत्वपूर्ण फल है| इसका उपयोग कई मूल्य संवर्धित उत्पादों जैसे आईसक्रीम, जैम, जैली, कैंडी, केक इत्यादि बनाने के लिए भी किया जाता है| इसकी खेती अन्य फल वाली फसलों की तुलना में कम समय में ज्यादा मुनाफा दिला सकती है| यह अल्प अवधि (4 से 5 महीने) में ही फलत देने वाली फसल है|

भारत में कुछ वर्षों पूर्व तक स्ट्रॉबेरी की खेती केवल पहाड़ी क्षेत्रों जैसे उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, कश्मीर घाटी, महाराष्ट्र, कालिम्पोंग इत्यादि जगहों तक ही सीमित थी| वर्तमान में नई उन्नत प्रजातियों के विकास से इसको उष्णकटिबंधीय जलवायु में भी सफलतापूर्वक उगाया जा रहा है| इसके कारण यह मैदानी भागों जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बिहार आदि राज्यों में अपनी अच्छी पहचान बना चुकी है|

 स्ट्रॉबेरी की वैरायटी

 आपको जानकर आश्चर्य होगा कि स्ट्रॉबेरी की लगभग 600 किस्में इस संसार में मौजूद है यह सभी अपने अलग-अलग स्वाद रंग रूप के लिए जानी जाती हैं लेकिन यदि भारत में बात करें तो कुछ ही किसमें  चलती हैं व्यवसायिक रूप से खेती करने के लिए कुछ प्रमुख किस्में हैं जिनका हम आपको नाम बताते हैं भारत में स्ट्रॉबेरी की बहुत सी किस्में उगाई जाती हैं| व्यावसायिक फल उत्पादन के लिए सही किस्मों का चुनाव बहुत जरूरी है| किस्मों का चयन क्षेत्र की जलवायु एवं भूमि की विशेषताओं को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए| देश में उगाई जाने वाली कुछ प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं, जैसे- चान्डलर, फेस्टिवल, विन्टर डॉन, फ्लोरिना, कैमा रोजा, ओसो ग्रैन्ड, ओफरा, स्वीट चार्ली, गुरिल्ला, टियोगा, सीस्कैप, डाना, टोरे, सेल्वा, बेलवी, फर्न, पजारो इत्यादि|

स्ट्रॉबेरी खेती के लिए जलवायु

स्ट्रॉबेरी को खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है, हालांकि कुछ किस्में उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में विकसित हो सकती हैं। वे छोटे दिन के पौधे हैं। फूलों के निर्माण के दौरान, उन्हें लगभग दस दिनों के लिए आठ से बारह घंटे के एक फोटोप्रोएड (सूर्य के प्रकाश) की आवश्यकता होती है। वे सुप्त होते हैं और सर्दियों के दौरान विकसित नहीं होते हैं। सर्दियों के बाद वसंत ऋतु आती है जब दिन बड़े होते हैं। इसलिए, पौधों को फूल के विकास की शुरुआत के लिए धूप मिलती है। हालांकि, उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाई जाने वाली किस्मों के मामले में जहां सर्दियां हल्की होती हैं, वहीं पौधे बढ़ते रहते हैं।

स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए मिट्टी

स्ट्रॉबेरी में एक रेशेदार जड़ प्रणाली होती है। इसलिए इसकी अधिकांश जड़ें अधिकतम 15 सेमी की गहराई तक रहती हैं। इसलिए, यह खेती के लिए एक good मिट्टी की आवश्यकता है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि स्ट्रॉबेरी उस खेत में उगाया नहीं जाता है जो पहले टमाटर, आलू, काली मिर्च या बैंगन की खेती के लिए उपयोग किया जाता था क्योंकि ये अत्यधिक पोषक तत्व निकालने वाले पौधे हैं। वे अपने पोषक तत्वों की मिट्टी को बहा देते हैं।

स्ट्रॉबेरी 5.0-6.5 के पीएच के साथ थोड़ा अम्लीय मिट्टी में सबसे अच्छा बढ़ता है।

स्ट्रॉबेरी रोपण का सही समय

स्ट्रॉबेरी की अधिकतम वनस्पति विकास शरद ऋतु के दौरान होती है। सर्दियों के शुरू होते ही यह निष्क्रिय हो जाता है। सर्दियों के बाद, यह वसंत के दौरान फूलना शुरू कर देता है। इसलिए, स्ट्रॉबेरी आमतौर पर सितंबर से अक्टूबर महीनों के दौरान लगाए जाते हैं।

स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए, भूमि को गहरी जुताई करनी चाहिए और उसके बाद कताई करनी चाहिए। जैविक खाद जैसे कि फार्म यार्ड खाद, नीम केक आदि को धावकों को रोपने से पहले मिट्टी में मिलाया जाता है। एक बार जुताई पूरी हो जाने के बाद जमीन को रोपण के लिए तैयार किया जाता है।

अधिक उपज लेने के लिए पौधे से पौधे एवं कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर रखी जाती है| यदि इस दूरी पर पौधों का रोपण करते हैं, तो एक हैक्टर के लिए लगभग 1 लाख 11 हजार पौधों की जरूरत होती है|

पानी की आवश्यकता और सिंचाई

लगातार पानी की आवश्यकता होती है और यह सूखे की स्थिति से प्रभावित होता है। हालांकि, मात्रा के लिहाज से इसे ज्यादा पानी की जरूरत नहीं है। नम रखने के लिए पानी की आवश्यकता होती है।

यदि रोपण के बाद नियमित रूप से सिंचाई की जाती है, तो शरद ऋतु में वृक्षारोपण वनस्पति विकास को बढ़ाता है। इसके अलावा, नव रोपित कलियों की लगातार सिंचाई से podhe में वृद्धि सुनिश्चित होती है जिससे उत्पादन जल्दी प्रभावित होता है। रोपण के समय, यदि वर्षा नहीं होती है, तो सप्ताह में दो बार खेत की सिंचाई की जाती है। नवंबर में एक सप्ताह में , दिसंबर और जनवरी के सर्दियों के महीनों के दौरान, हर पंद्रह दिनों में एक बार सिंचाई की जाती है। जब फूल स्ट्रॉबेरी, फलों में विकसित होने लगते हैं तो एक सप्ताह एक बार पानी देना चाहिए. फलने की अवस्था के दौरान लगातार सिंचाई करने से बड़े फल देने में मदद मिलती है।

अधिक सिंचाई पौधे के लिए हानिकारक है। फूलों की पत्तियों या फलों को गीला करने से फंगल संक्रमण की संभावना बढ़ सकती है। फसल की अवधि के दौरान sवधानी से सिंचाई आवश्यक है ताकि अच्छी गुणवत्ता वाले फल प्राप्त हो सकें।

पलवार बिछाना

स्ट्रॉबेरी उत्पादन में यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है| यह कार्य जमीन की ऊपरी सतह पर सूखे पत्तों, टहनियों या घासफूस से ढककर किया जाता है| परंतु आजकल पलवार बिछाने के लिए अधिकतर प्लास्टिक मल्च का प्रयोग किया जाता है| स्ट्रॉबेरी में इसका प्रयोग करने से फल सीधे मिट्टी के संपर्क में नहीं आते हैं| इससे फलों को सड़ने से बचाया जा सकता है| साथ ही यह खरपतवारों का नियंत्रण करने एवं सिंचाई की आवश्यकता को कम करने का कार्य करती है|

पलवार के लिए सामान्यतया काले रंग की लगभग 50 माइक्रॉन मोटाई वाली प्लास्टिक की फिल्म का उपयोग किया जाता है| प्लास्टिक फिल्म बिछाने का कार्य पौध रोपण के लगभग एक महीने बाद, जब पौधे अच्छी तरह स्थापित हो जाएं, तब करते हैं| क्यारियों में प्लास्टिक पलवार बिछाते समय पौधे से पौधे व कतार से कतार की दूरी को ध्यान में रखते हुए छेद करते हैं, जिससे पौधे आसानी से ऊपर आ जाएं| पलवार बिछाने से पूर्व ड्रिप (टपक) सिंचाई प्रणाली क्यारियों में व्यवस्थित कर दी जाती है|

खाद एवं उर्वरक

खाद एवं उर्वरकों के उपयोग का मुख्य उद्देश्य पौधों के समुचित विकास और बढ़वार के साथ ही मृदा में अनुकूल पोषण दशाएं बनाए रखना होता है| उर्वरकों को काम में लेने का उचित समय सामान्य तौर पर मृदा प्रकार, पोषक तत्व, जलवायु और फसल के स्वभाव पर निर्भर करता है| इनकी मात्रा, मृदा की उर्वरता तथा फसल को दी गई कार्बनिक खादों की मात्रा पर निर्भर करती है| यदि संतुलित मात्रा में खाद एवं उर्वरक दिए जाएं तो निश्चित रूप से पौधों की अच्छी बढ़वार और अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है|

अत: हमेशा मृदा जांच के उपरांत ही खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए| सामान्यतः खेत तैयार करते समय 10 से 12 टन कम्पोस्ट खाद, 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 किलोग्राम फॉस्फोरस व 25 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ की दर से डालनी चाहिए| इसमें फर्टिगेशन के रूप में एन पी के 19:19:19 की 25 ग्राम मात्रा प्रति वर्गमीटर की दर से सम्पूर्ण फसल चक्र में देनी चाहिए| यह मात्रा 15 दिनों के अंतराल पर 4 से 5 भागों में बांटकर देनी चाहिए| स्ट्रॉबेरी में सूक्ष्म पोषक तत्वों का छिड़काव भी उत्पादन बढ़ाने में सहायक होता है|

कीट

लगभग 200 से अधिक कीटों की प्रजातियां स्ट्रॉबेरी की फसल को सीधे या परोक्ष रूप से हमला करने के लिए जानी जाती है। ये कीटों में पतिंगे, मक्खियां, chafers, स्ट्रॉबेरी जड़ वीविल्स, झरबेरी एक प्रकार का कीड़ा, स्ट्रॉबेरी रस भृंग, स्ट्रॉबेरी मुकुट कीट, कण, aphids इत्यादि शामिल हैं।

रोग

स्ट्राबेरी के पौधे विभिन्न रोगों के शिकार हो सकते हैं। इसकी पत्तियां ख़स्ता फफूंदी, पत्ता स्पॉट (कवक Sphaerella fragariae द्वारा कारण), पत्ता ब्लाइट (कवक Phomopsis obscurans के कारण) से संक्रमित हो सकती हैं। शीर्ष एवं जड़ें red stele, verticillium wilt, black root rot एवं नेमाटोड्स के शिकार हो सकता है। फलों को ग्रे मोल्ड, rhizopus rot और leather rot से नुकसान हो सकता है। पौधों में सर्दियों के दौरान अत्यधिक तापमान बढ़ने से भी रोग विकसित हो सकते हैं। जब अपने स्ट्रॉबेरी के पौधों में पानी देते समय यह ध्याम रखें कि पानी पत्तों को नहीं जड़ों को ही दें अन्यथा पत्तियों पर नमी कवक के विकास को प्रोत्साहित करती है। सुनिश्चित करें कि स्ट्रॉबेरी एक खुले क्षेत्र में हो जिससे कि कवक रोगों का खतरा कम किया जा सके।

पैदावार

स्ट्रॉबेरी के फलों की उपज कई बातों पर निर्भर करती है| इनमें उगाई जाने वाली किस्म, जलवायु, मृदा, पौधों की संख्या, फसल प्रबंधन इत्यादि प्रमुख हैं| इसके प्रति पौधे से एक मौसम में 500 से 700 ग्राम फल प्राप्त किए जा सकते हैं| एक एकड़ क्षेत्रफल में 80 से 100 क्विटल फलों का उत्पादन हो जाता है| यह उत्पादन उपरोक्त वैज्ञानिक तकनीक और अच्छे फसल प्रबंधन से बढ़ाया भी जा सकता है|

अगर हम मिनिमम मूल्य 200 प्रति KG के हिसाब से गणना करेंगे, तो कुल कमाई होगी (8000 x 200 = 1600,000), सोलह लाख रुपये प्रति एकड़.

स्टीविया की खेती : एक बार लगाकर पांच साल तक कमाएं

परिचय:
स्टीविया स्टीविया रुबिडियाना (मीठी तुलसी) एक झाड़ीनुमा पौधा है इसका मूल उत्पन्न स्थल पूर्वी पुरुग्वे है ! अमेरिका ब्राजील जापान कोरिया ताइवान एवं दक्षिण पूर्व एशिया में खूब पाया जाता है इससे चीनी तो नहीं बनाई जा सकती लेकिन उसमें उपलब्ध मिठास, चीनी से 300 गुना अधिक होती है !
  अतः स्वास्थ्य के प्रति जागरूक व्यक्ति जो चीनी नहीं खाना पसंद नहीं करते उनकी चाय की मिठास के लिए स्टीविया को आयुर्वेदिक मिठास रूप में प्रयोग किया जाता है अब भारत में भी इसकी अच्छी खासी डिमांड होने लगी है क्योंकि भारत में भी स्वास्थ्य के प्रति लोग जागरूक हो रहे हैं जिन्हें शुगर की समस्या है उन्हें शक्कर की जगह इसका उपयोग करना चाहिए

 स्टीविया का प्रयोग:

 मधुमेह रोगियों के लिए इंसुलिन को कंट्रोल रखने के लिए यह एक मात्र विकल्प इसके अलावा  स्टीविया का  प्रयोग मिठाइयों में औषधियों में और विभिन्न प्रकार की खाद्य  पदार्थों में भी किया जाता है।

 स्टीविया की खेती:

 यह एक समशीतोष्ण जलवायु का पौधा है भारत  में लगभग सभी जगह से लगाया जा सकता है , तेज प्रकाश एवं गर्म तापमान  मैं  स्टीविया की पत्नियों का निर्माण अधिक होता है स्टीविया में किसी भी तरह के कीट नहीं लगता है इसलिए कीटनाशक  का  खर्चा नहीं होता इसके अलावा इसमें सिर्फ  जैविक खाद ही उपयोग की जा सकती।

 मृदा की  आवश्यकता:

 जल निकास वाली रेतीली दोमट मिट्टी से लेकर चिकनी मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है मिट्टी का पीएच मान 6.5- 7.5 के बीच होना चाहिए मृदा में कार्बनिक तत्वों की उपलब्धता को बनाए रखने का विशेष ध्यान देना चाहिए ! छारीय मृदा एवं जल भराव वाले क्षेत्र में स्टीविया  के लिए  अनुकूल नहीं  होता।

 खेत की तैयारी:

 स्टीविया के लिए मृदा में कार्बनिक तत्वों का होना आवश्यक है इसके लिए प्रति एकड़ 8 से 10 टन गोबर की खाद को सही तरह से  खेत  में मिला देना चाहिए इसके अलावा जैविक खाद जैसे कि एजोटोबेक्टर, पीएसबी कल्चर  एवं ट्राइकोडरमा भी उपयोग करना  चाहिए।

 1 एकड़ में लगभग 40,000  पौधे  लगाए जाते हैं! इन्हें बेड पर लगाया जाता है और यदि आप मल्चिंग शीट का उपयोग करें तो और भी अच्छा होगा क्योंकि मल्चिंग शीट उपयोग करने से खरपतवार की समस्या नहीं रहती और नमी सामान्य बनी रहती।  खेत  में किसी भी तरह का पानी का भराव नहीं होना चाहिए  इसलिए  इनके पौधों को बेड पर लगाया जाता है।। सिंचाई के लिए आप ड्रिप या फ्लड पद्धति  का उपयोग कर सकते हैं। सर्दियों के मौसम में 1 सप्ताह में एक बार और गर्मियों के मौसम में दो-तीन दिन में एक बार पानी देना होता है।  वैसे तो इसमें किसी तरह के कीट नहीं लगते फिर भी किसी तरह का आपको लगे तो विशेषज्ञ से सलाह लेना चाहिए और किसी भी तरह का रासायनिक खाद है या रासायनिक कीटनाशक उपयोग नहीं करना चाहिए।

 आर्थिक भाग:

 1 एकड़ खेत में 1 साल में  लगभग ढाई हजार किलो पत्तियां प्राप्त होती हैं । हर 3 महीने पर इस की कटाई होती है। यानी कि 1 साल में 4 बार कटाई होती है और सबसे अच्छी बात यह है कि एक बार फसल लगाने के बाद यह लगातार पांच साल तक हमें उपज देता रहता है।

यदि आज के मार्केट भाव की बात करें तो 150 प्रति किलो के हिसाब से लगभग चल रहा है। इस हिसाब से 2,500 किलो सूखे पत्तियो की कीमत 375,000 होती यदि इस अमाउंट में से लागत के रूप में 100,000 रुपए घटा लिए जाएं तो भी 275,000 प्रति एकड़ का शुद्ध मुनाफा किसान को हो सकता है।इसके अलावा इस पौधे में साल  भर  बीज लगता रहता है जिसे ऊंचे दामों पर बेचा जा सकता है!

ड्रैगन फ्रूट की खेती

ड्रैगन फ्रूट कैक्टस प्रजाति से मिलता-जुलता फल होता है जो कुछ देशों में Pitya फ्रूट के नाम से भी जाना जाता है. इसके अलावा ड्रैगन फ्रूट को क्वीन ऑफ द नाइट भी कहा जाता है, क्योंकि इसका फूल सिर्फ रात के समय ही तेजी से बढ़ता है. और Dragon Fruit की एक ख़ास बात इसको सुपर फूड का दर्जा भी दिया गया है.

लेकिन अमेरिका (US) में सबसे पहले इसकी खोज होने के बाद इसको एक सुपर फ़ूड (Super Food) का दर्जा दिया गया. और दुनियाभर में ये खाने और दवाइयां बनाने के लिए काम में लिया जाने लगा.

फ्रूट की खेती अब भारत में भी इसकी शुरू हो चुकी है । ड्रैगन फ्रूट की खेती पहले इसराइल थाईलैंड मलेशिया श्रीलंका में काफी समय से होती आ रही है और इस फल की मांग और भाव के कारण भारत के किसान भाई भी इस व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं।

ड्रैगन  फ्रूट के प्रकार:

ड्रैगन फ्रूट मुख्य तीन प्रकार के होते हैं!

1.सफेद  रंग के गूदे वाला लाल रंग का फल

2.लाल रंग के गूदे वाला लाल रंग का फल।

3. सफेद रंग के गूदे वाला पीला रंग  का फल।

ड्रैगन फ्रूट के फायदे :

ड्रैगन फ्रूट हमें ज्यादा मात्रा में प्रोटीन देता है| इसके अलावा ये मानव शरीर में कई सारी बीमारियों को ठीक करने की क्षमता रखता है| यह फ्रूट हमें दैनिक जीवन में ज़रूर इस्तेमाल करना चाहिए| इसमें पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं.

  • ड्रैगन फ्रूट केलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने में मदद करता है
  • शुगर डायबिटीज़ के रोगियों के लिए फायदेमंद है
  • ड्रैगन फ्रूट फाइबर युक्त होता है, जो आपके शरीर में ज़रूरी पोषक तत्व (Nutrition)की कमियों को पूरा करता है
  • इसके सेवन से कार्डियोवैस्कुलर रोग (सीवीडी) होने का ख़तरा काम हो जाता है
  • हार्ट अटैक जैसे गंभीर रोगों से बचाव करता है
  • ड्रैगन फ्रूट में एंटी ऑक्सीडेंट (Anti Oxidant) गुण भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं
  • पोटैशियम और विटामिन सी ड्रैगन फ्रूट में प्रचुर मात्रा में होते हैं

 ड्रैगन फुट के लिए जलवायु:

 ड्रैगन फ्रूट उपोष्ण जलवायु का पौधा है! फलों के विकास एवं पकने के समय गर्म एवं शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है .इसके पौधे कम उपजाऊ मिट्टी और तापमान में होने वाले लगातार परिवर्तनों के बीच भी जीवित रह सकते हैं इसके लिए 50 से 55 सेंटीमीटर वार्षिक औसत वार्षिक की आवश्यकता होती है तथा 25 से 32 डिग्री सेल्सियस तापमान  उचित होता।।

ड्रैगन फ्रूट के  बुवाई की विधि:

  इस पौधे को खेत में पोल के सहारे लगाया जाता है एक पोल पर 4 पौधे लगाए जाते हैं!  1 एकड़ भूमि में लगभग 425 खंभे लगाए जाते हैं और इन 425 खंभों पर  पर 4 पौधे के हिसाब से लगभग 1700  पौधे  लगाए जाते हैं।

 खेत को  तैयार करने के लिए 50 x 50 x 50 सेंटीमीटर आकार के 4 गड्ढे/ पोल, मई के महीने में खोदकर 15  दिनों के  लिए खुला छोड़ देना चाहिए ताकि इसमें अच्छी तरह से धूप लग जाए और हानिकारक कीड़े मकोड़े रोगाणु वगैरह नष्ट हो जाए.

2 से 3 साल के अंदर फल आना शुरू होते हैं और लगभग 25 साल तक इसमें फल आते हैं तो एक बार लगाने के बाद किसान लगातार 23-25 साल तक इसका फायदा ले सकता।

 ड्रैगन फ्रूट से आय:

 आज के समय में ड्रैगन फ्रूट का लगभग  600 से 700 रुपए किलो के बीच है,  थोक में 150- 200- रुपए किलो आसानी से इसे बेचा जा सकता!

 अब हम 425 पिलर के हिसाब से कैलकुलेशन करते हैं और यह मानकर चलते हैं कि मिनिमम एक पिलर पर 15-20 Kg फल आते हैं तो 425×15  करेंगे तो 6375 किलो फल प्राप्त होते हैं

6375 किलो फल यदि मिनिमम 150 प्रति केजी के हिसाब से भी देखें तो यह वैल्यू बनती है 956,250 रुपए प्रति एकड़।

हमारी संस्था किसानो को उच्च गुणवत्ता के पौधे उपलब्ध करने से लेकर, संपूर्ण वैज्ञानिक विधि से उसकी खेती कराने मे किसानो की सहायता करती है, साथ ही किसानों को मार्केट के खरीददारों से भी संपर्क कराती है। किसी भी अन्य जानकारी के लिए आप नीचे दी गयी लिंक पर क्लिक करके चाही गयी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

इस महीने कर सकते हैं पपीते की खेती, मिलेगी बढ़िया पैदावार


 क्षेत्रफल की दृष्टि से यह हमारे देश का पांचवा लोकप्रिय फल है। यह बारहों महीने होता है, लेकिन यह फ़रवरी-मार्च से मई से अक्टूबर के मध्य विशेष रूप से पैदा होता है, क्योंकि इसकी सफल खेती के लिए 10 डिग्री से. से 40 डिग्री से. तापमान उपयुक्त है। इसके फल विटामिन A और C के अच्छे स्त्रोत है। विटामिन के साथ पपीता में पपेन नामक एंजाइम पाया जाता है जो शरीर की अतिरिक्त चर्बी को हटाने में सहायक होता है। स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होने के साथ ही पपीता सबसे कम दिनों में तैयार होने वाले फलों में से एक है जो कच्चे और पके दोनों ही रूपों में उपयोगी है। इसका आर्थिक महत्व ताजे फलों के अतिरिक्त पपेन के कारण भी है, जिसका प्रयोग बहुत से औद्योगिक कामों (जैसे कि खाद्य प्रसंस्करण, कपड़ा उद्योग आदि) में होता है! अच्छी उपज पपीते की खेती के लिए बलुई दोमट प्रकार की मिट्टी सर्वोतम है।

पपीते के खेतों में यह ध्यान रखना होगा :

जल का जमाव ना हो। बीज लगाने से पहले भूमि की ठीक प्रकार से गहरी जुताई के साथ खर-पतवार का निस्तारण करना आवश्यक है। पपीते के लिहाज से मिट्‌टी का पीएच (pH) मान 6.5 से 7.5 तक होना चाहिए। उन्नत किस्म के चयन के बाद बीजों को क्यारियों में नर्सरी बनाने के लिए बोना चाहिए, जो जमीन सतह से 15 सेंटीमीटर ऊंची व 1 मीटर चौड़ी तथा जिनमें गोबर की खाद, कंपोस्ट या वर्मी कंपोस्ट को अच्छी मात्रा में मिलाया गया हो।
पौधे को पद विगलन रोग से बचाने के लिए क्यारियों को फार्मलीन के 1:40 के घोल से उपचारित कर लेना चाहिए और बीजों को 0.1 % कॉपर आक्सीक्लोराइड के घोल से उपचारित करके बोना चाहिए। 1/2′ गहराई पर 3’x6′ के फासले पर पंक्ति बनाकर उपचारित बीज बोयें और फिर 1/2′ गोबर की खाद के मिश्रण से ढ़क कर लकड़ी से दबा दें ताकि बीज ऊपर न रह जाये। नमी बनाए रखने के लिए क्यारियों को सूखी घास या पुआल से ढकना एक सही तरीका है। सुबह शाम होज द्वारा पानी देते रहने से, लगभग 15-20 दिन भीतर बीज जम (germination) जाते हैं।
पौधों की ऊंचाई जब 15 से. मी. हो तो साथ ही 0.3% फफूंदीनाशक घोल का छिड़काव कर देना चाहिए। जब इन पौधों में 4-5 पत्तियाँ और ऊँचाई 25 से.मी. हो जाये तो दो महीने बाद खेत में प्रतिरोपण करना चाहिए, प्रतिरोपण से पहले गमलों को धूप में रखना चाहिए।
पौधों के रोपण के लिए खेत को अच्छी तरह से तैयार करके 2 x2 मीटर की दूरी पर 50x50x50 सेंटीमीटर आकार के गड्‌ढे मई के महीने में खोद कर 15 दिनों के लिए खुले छोड़ देने चाहिएं. अधिक तापमान और धूप, मिट्टी में उपस्थित हानिकारक कीड़े-मकोड़े, रोगाणु इत्यादि नष्ट कर देती है। पौधे लगाने के बाद गड्‌ढे को मिट्‌टी और गोबर की खाद 50 ग्राम एल्ड्रिन (कीटनाशक) मिलाकर इस प्रकार भरना चाहिए कि वह जमीन से 10-15 सेंटीमीटर ऊंचा रहे। रोजाना दोपहर बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए।


खाद व उर्वरक का रखे खास खयाल :


खाद और उर्वरक के प्रभाव में पपीते के पौधे अच्छी वृद्धि करते हैं। पौधा लगाने से पहले गोबर की खाद मिलाना एक अच्छा उपाय है!
इस पूरे उर्वरक की मात्रा को 50 से 60 दिनों के अंतराल में विभाजित कर लेना चाहिए और कम तापमान के समय इसे डालें।
पौधों के रोपण के 4 महीने बाद ही उर्वरक का प्रयोग करना उत्तम परिणाम देगा।
पपीते के पौधे 90 से 100 दिन के अन्दर फूलने लगते हैं और नर फूल छोटे-छोटे गुच्‍छों में लम्बे डंढल युक्त होते हैं। नर पौधों पर पुष्प 1 से 1.3 मी. के लम्बे तने पर झूलते हुए और छोटे होते है। प्रति 100 मादा पौधों के लिए 5 से 10 नर पौधे छोड़ कर शेष नर पौधों को उखाड देना चाहिए। मादा पुष्प पीले रंग के 2.5 से.मी. लम्बे और तने के नजदीक होते हैं। गर्मियों में 6 से 7 दिन के अन्तराल पर तथा सर्दियों में 10-12 दिनों के अंतराल पर सिंचाई के साथ खरपतवार प्रबंधन, कीट और रोग प्रबंधन करना चाहिए।

समय रहते करें रोग नियंत्रण:

पपीते के पौधों में मुख्यतः मोजैक लीफ कर्ल, डिस्टोसर्न, रिंगस्पॉट, जड़ व तना सड़न, एन्थ्रेक्नोज और कली व पुष्प वृंत का सड़ना आदि रोग लगते हैं।
इनके नियंत्रण में वोर्डोमिक्सचर 5:5:20 के अनुपात का पेड़ों पर सडन गलन को खरोचकर लेप करना चाहिए। अन्य रोग के लिए व्लाईटाक्स 3 ग्राम या डाईथेन एम्-45, 2 ग्राम प्रति लीटर अथवा मैन्कोजेब या जिनेव 0.2% से 0.25 % का पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए अथवा कॉपर आक्सीक्लोराइट 3 ग्राम या व्रासीकाल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करना चाहिए।
  पपीते के पौधों को कीटों से कम नुकसान पहुचता है फिर भी कुछ कीड़े लगते हैं जैसे माहू, रेड स्पाईडर माईट, निमेटोड आदि हैं। नियंत्रण के लिए डाईमेथोएट 30 ई. सी.1.5 मिली लीटर या फास्फोमिडान 0.5 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से माहू आदि का नियंत्रण होता है।
निमेटोड पपीते को बहुत नुकसान पहुंचता है और पौधे की वृद्धि को प्रभावित करता है। इथिलियम डाइब्रोमाइड 3 किग्रा प्रति हे. का प्रयोग करने से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है.
साथ ही अंतरशस्य गेंदा का पौधा लगाने से निमाटोड की वृद्धि को रोका जा सकता है। 
 दस से बारह महीने में तैयार हो जाती है फसल 10 से 12 महीने के बाद पपीते के फल तोड़ने लायक हो जाते हैं। जब फलों का रंग हरे से बदलकर पीला होने लगे एवं फलों पर नाखुन लगने से दूध की जगह पानी तथा तरल निकलने लगे, तो फलों को तोड़ लेना चाहिए। फलों के पकने पर चिडियों से बचाना अति आवश्यक है अत: फल पकने से पहले ही तोड़ना चाहिए। फलों को तोड़ते समय किसी प्रकार के खरोच या दाग-धब्बे से बचाना चाहिए वरना उसके भण्डारण में ही सड़ने की सभावना होती हैl

कृषि कानून बिल 2020- एक संछिप्त परिचय

2020–2021 भारतीय किसानों का विरोध तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहा है, जिसे भारत की संसद ने सितंबर 2020 में पारित किया था।

किसान यूनियनों और उनके प्रतिनिधियों ने मांग की है कि कानूनों को निरस्त किया जाए और कहा गया है कि वे एक समझौता स्वीकार नहीं करेंगे। किसान नेताओं ने खेत कानूनों को लागू करने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर रोक का स्वागत किया है लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति को खारिज कर दिया है।

किसान नेताओं ने भी 18 महीने के कानूनों को निलंबित करते हुए, 21 जनवरी 2021 के एक सरकारी प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। 14 अक्टूबर 2020 और 22 जनवरी 2021 के बीच कृषि संघों द्वारा प्रतिनिधित्व केंद्र सरकार और किसानों के बीच ग्यारह दौर की वार्ता हुई है; सभी अनिर्णायक थे। 3 फरवरी को किसान नेताओं ने कृषि कानूनों को निरस्त नहीं किए जाने पर सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए विरोध प्रदर्शन तेज करने की चेतावनी दी।  

कई किसान संघों द्वारा अक्सर कृषि बिल, को “किसान विरोधी कानून” कहा जाता है,] और विपक्ष के राजनेताओं का यह भी कहना है कि यह किसानों को “corporate की दया” पर छोड़ देगा। “।  किसानों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बिल के निर्माण की भी मांग की है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कॉरपोरेट कीमतों को नियंत्रित न कर सकें। हालांकि, सरकार का कहना है कि कानून किसानों को अपनी उपज सीधे बड़े खरीदारों को बेचने के लिए सरल बनाएंगे, और कहा कि विरोध गलत सूचना पर आधारित है।

कानूनों की शुरुआत के तुरंत बाद, यूनियनों ने स्थानीय विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया, ज्यादातर पंजाब में। दो महीने के विरोध प्रदर्शन के बाद, पंजाब और हरियाणा के किसान संघों ने विशेष रूप से दिल्ही चलो (चलो दिल्ली चलो) नाम से एक आंदोलन शुरू किया, जिसमें दसियों हज़ार किसान यूनियन के सदस्यों ने देश की राजधानी की ओर कूच किया। भारत सरकार ने विभिन्न राज्यों के पुलिस और कानून प्रवर्तन को आदेश दिया कि किसान यूनियनों को पानी के तोपों, डंडों और आंसू गैस का उपयोग करके प्रदर्शनकारियों पर हमला किया जाए ताकि किसान संघों को पहले हरियाणा और फिर दिल्ली में प्रवेश करने से रोका जा सके।

 26 नवंबर 2020 को, ट्रेड यूनियनों के दावे के अनुसार, 250 मिलियन लोगों की देशव्यापी आम हड़ताल, किसान यूनियनों के समर्थन में हुई। 30 नवंबर को, 200,000 और 300,000 किसानों की अनुमानित भीड़ दिल्ली के रास्ते में विभिन्न सीमा ओं पर जुट रही थी।

जबकि किसान संघों का एक वर्ग विरोध कर रहा है, भारत सरकार का दावा है कि कुछ यूनियनें कृषि कानूनों के समर्थन में सामने आई हैं।किसान संघों के समर्थन में 14 मिलियन से अधिक ट्रक ड्राइवरों का प्रतिनिधित्व करने वाली परिवहन यूनियनें कुछ राज्यों में आपूर्ति बंद करने की धमकी दे रही हैं। [32] 4 दिसंबर को वार्ता के दौरान सरकार द्वारा किसान यूनियनों की मांगों को खारिज करने के बाद, यूनियनों ने 8 दिसंबर 2020 को एक और भारत व्यापी हड़ताल को आगे बढ़ाने की योजना बनाई। सरकार ने कानूनों में कुछ संशोधन की पेशकश की, लेकिन यूनियनों ने कानूनों को पूर्ण रूप से निरस्त करने की मांग की। 12 दिसंबर से, हरियाणा में किसान यूनियनों ने राजमार्ग टोल प्लाजा पर कब्जा कर लिया और वाहनों की मुफ्त आवाजाही की अनुमति दी।

दिसंबर के मध्य तक, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं का एक बैच प्राप्त किया था, जिसने दिल्ली के आसपास प्रदर्शनकारियों द्वारा बनाई गई अवरोधक हटाने के लिए कहा।  अदालत ने सरकार से कानूनों को रोक देने के लिए कहा, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। 4 जनवरी 2021 को अदालत ने प्रदर्शनकारी किसानों के पक्ष में पहली याचिका दायर की।  किसानों ने कहा है कि अगर उन्होंने कहा कि वे कोर्ट को नहीं सुनेंगे उनके नेताओं ने यह भी कहा है कि कृषि कानूनों का बने रहना कोई हल नहीं है।

30 दिसंबर को, भारत सरकार ने किसानों की दो मांगों पर सहमति व्यक्त की; नए विद्युत अध्यादेश में मलबे को जलाने और छोड़ने के कानूनों को रोकने के लिए किसानों को कानूनों से बाहर करना।

26 जनवरी को, कृषि सुधारों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हजारों किसानों ने ट्रैक्टरों के बड़े काफिले के साथ किसान परेड की और दिल्ली में धरना दिया। प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली पुलिस द्वारा स्वीकृत पूर्व-स्वीकृत मार्गों से भटक गए। ट्रैक्टर रैली कुछ बिंदुओं पर हिंसक विरोध में बदल गई क्योंकि प्रदर्शनकारी किसानों ने पुलिस के साथ बैरिकेड्स और चक्काजाम किया। बाद में प्रदर्शनकारियों ने लाल किले पर पहुंचकर लाल किले की प्राचीर पर मस्तूल पर किसान संघ के झंडे और धार्मिक झंडे लगाए।