STRAWBERRY FARMING GUIDE

स्ट्राबेरी की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

स्ट्रॉबेरी फ़्रागार्या जाति का एक पेड़ होता है, जिसके फल के लिये इसकी विश्वव्यापी खेती की जाती है। इसके फल को भी इसी नाम से जाना जाता है। स्ट्रॉबेरी की विशेष गन्ध इसकी पहचान बन गयी है। ये चटक लाल रंग की होती है। इसे ताजा भी, फल के रूप में खाया जाता है, साथ ही इसे संरक्षित कर जैम, रस, पाइ, आइसक्रीम, मिल्क-शेक आदि के रूप में भी इसका सेवन किया जाता है।

इन फलों में विटामिन- सी तथा लौह तत्व प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं| यह अपने विशेष स्वाद एवं रंग के साथ-साथ औषधीय गुणों के कारण भी एक महत्वपूर्ण फल है| इसका उपयोग कई मूल्य संवर्धित उत्पादों जैसे आईसक्रीम, जैम, जैली, कैंडी, केक इत्यादि बनाने के लिए भी किया जाता है| इसकी खेती अन्य फल वाली फसलों की तुलना में कम समय में ज्यादा मुनाफा दिला सकती है| यह अल्प अवधि (4 से 5 महीने) में ही फलत देने वाली फसल है|

भारत में कुछ वर्षों पूर्व तक स्ट्रॉबेरी की खेती केवल पहाड़ी क्षेत्रों जैसे उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, कश्मीर घाटी, महाराष्ट्र, कालिम्पोंग इत्यादि जगहों तक ही सीमित थी| वर्तमान में नई उन्नत प्रजातियों के विकास से इसको उष्णकटिबंधीय जलवायु में भी सफलतापूर्वक उगाया जा रहा है| इसके कारण यह मैदानी भागों जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बिहार आदि राज्यों में अपनी अच्छी पहचान बना चुकी है|

 स्ट्रॉबेरी की वैरायटी

 आपको जानकर आश्चर्य होगा कि स्ट्रॉबेरी की लगभग 600 किस्में इस संसार में मौजूद है यह सभी अपने अलग-अलग स्वाद रंग रूप के लिए जानी जाती हैं लेकिन यदि भारत में बात करें तो कुछ ही किसमें  चलती हैं व्यवसायिक रूप से खेती करने के लिए कुछ प्रमुख किस्में हैं जिनका हम आपको नाम बताते हैं भारत में स्ट्रॉबेरी की बहुत सी किस्में उगाई जाती हैं| व्यावसायिक फल उत्पादन के लिए सही किस्मों का चुनाव बहुत जरूरी है| किस्मों का चयन क्षेत्र की जलवायु एवं भूमि की विशेषताओं को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए| देश में उगाई जाने वाली कुछ प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं, जैसे- चान्डलर, फेस्टिवल, विन्टर डॉन, फ्लोरिना, कैमा रोजा, ओसो ग्रैन्ड, ओफरा, स्वीट चार्ली, गुरिल्ला, टियोगा, सीस्कैप, डाना, टोरे, सेल्वा, बेलवी, फर्न, पजारो इत्यादि|

स्ट्रॉबेरी खेती के लिए जलवायु

स्ट्रॉबेरी को खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है, हालांकि कुछ किस्में उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में विकसित हो सकती हैं। वे छोटे दिन के पौधे हैं। फूलों के निर्माण के दौरान, उन्हें लगभग दस दिनों के लिए आठ से बारह घंटे के एक फोटोप्रोएड (सूर्य के प्रकाश) की आवश्यकता होती है। वे सुप्त होते हैं और सर्दियों के दौरान विकसित नहीं होते हैं। सर्दियों के बाद वसंत ऋतु आती है जब दिन बड़े होते हैं। इसलिए, पौधों को फूल के विकास की शुरुआत के लिए धूप मिलती है। हालांकि, उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाई जाने वाली किस्मों के मामले में जहां सर्दियां हल्की होती हैं, वहीं पौधे बढ़ते रहते हैं।

स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए मिट्टी

स्ट्रॉबेरी में एक रेशेदार जड़ प्रणाली होती है। इसलिए इसकी अधिकांश जड़ें अधिकतम 15 सेमी की गहराई तक रहती हैं। इसलिए, यह खेती के लिए एक good मिट्टी की आवश्यकता है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि स्ट्रॉबेरी उस खेत में उगाया नहीं जाता है जो पहले टमाटर, आलू, काली मिर्च या बैंगन की खेती के लिए उपयोग किया जाता था क्योंकि ये अत्यधिक पोषक तत्व निकालने वाले पौधे हैं। वे अपने पोषक तत्वों की मिट्टी को बहा देते हैं।

स्ट्रॉबेरी 5.0-6.5 के पीएच के साथ थोड़ा अम्लीय मिट्टी में सबसे अच्छा बढ़ता है।

स्ट्रॉबेरी रोपण का सही समय

स्ट्रॉबेरी की अधिकतम वनस्पति विकास शरद ऋतु के दौरान होती है। सर्दियों के शुरू होते ही यह निष्क्रिय हो जाता है। सर्दियों के बाद, यह वसंत के दौरान फूलना शुरू कर देता है। इसलिए, स्ट्रॉबेरी आमतौर पर सितंबर से अक्टूबर महीनों के दौरान लगाए जाते हैं।

स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए, भूमि को गहरी जुताई करनी चाहिए और उसके बाद कताई करनी चाहिए। जैविक खाद जैसे कि फार्म यार्ड खाद, नीम केक आदि को धावकों को रोपने से पहले मिट्टी में मिलाया जाता है। एक बार जुताई पूरी हो जाने के बाद जमीन को रोपण के लिए तैयार किया जाता है।

अधिक उपज लेने के लिए पौधे से पौधे एवं कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर रखी जाती है| यदि इस दूरी पर पौधों का रोपण करते हैं, तो एक हैक्टर के लिए लगभग 1 लाख 11 हजार पौधों की जरूरत होती है|

पानी की आवश्यकता और सिंचाई

लगातार पानी की आवश्यकता होती है और यह सूखे की स्थिति से प्रभावित होता है। हालांकि, मात्रा के लिहाज से इसे ज्यादा पानी की जरूरत नहीं है। नम रखने के लिए पानी की आवश्यकता होती है।

यदि रोपण के बाद नियमित रूप से सिंचाई की जाती है, तो शरद ऋतु में वृक्षारोपण वनस्पति विकास को बढ़ाता है। इसके अलावा, नव रोपित कलियों की लगातार सिंचाई से podhe में वृद्धि सुनिश्चित होती है जिससे उत्पादन जल्दी प्रभावित होता है। रोपण के समय, यदि वर्षा नहीं होती है, तो सप्ताह में दो बार खेत की सिंचाई की जाती है। नवंबर में एक सप्ताह में , दिसंबर और जनवरी के सर्दियों के महीनों के दौरान, हर पंद्रह दिनों में एक बार सिंचाई की जाती है। जब फूल स्ट्रॉबेरी, फलों में विकसित होने लगते हैं तो एक सप्ताह एक बार पानी देना चाहिए. फलने की अवस्था के दौरान लगातार सिंचाई करने से बड़े फल देने में मदद मिलती है।

अधिक सिंचाई पौधे के लिए हानिकारक है। फूलों की पत्तियों या फलों को गीला करने से फंगल संक्रमण की संभावना बढ़ सकती है। फसल की अवधि के दौरान sवधानी से सिंचाई आवश्यक है ताकि अच्छी गुणवत्ता वाले फल प्राप्त हो सकें।

पलवार बिछाना

स्ट्रॉबेरी उत्पादन में यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है| यह कार्य जमीन की ऊपरी सतह पर सूखे पत्तों, टहनियों या घासफूस से ढककर किया जाता है| परंतु आजकल पलवार बिछाने के लिए अधिकतर प्लास्टिक मल्च का प्रयोग किया जाता है| स्ट्रॉबेरी में इसका प्रयोग करने से फल सीधे मिट्टी के संपर्क में नहीं आते हैं| इससे फलों को सड़ने से बचाया जा सकता है| साथ ही यह खरपतवारों का नियंत्रण करने एवं सिंचाई की आवश्यकता को कम करने का कार्य करती है|

पलवार के लिए सामान्यतया काले रंग की लगभग 50 माइक्रॉन मोटाई वाली प्लास्टिक की फिल्म का उपयोग किया जाता है| प्लास्टिक फिल्म बिछाने का कार्य पौध रोपण के लगभग एक महीने बाद, जब पौधे अच्छी तरह स्थापित हो जाएं, तब करते हैं| क्यारियों में प्लास्टिक पलवार बिछाते समय पौधे से पौधे व कतार से कतार की दूरी को ध्यान में रखते हुए छेद करते हैं, जिससे पौधे आसानी से ऊपर आ जाएं| पलवार बिछाने से पूर्व ड्रिप (टपक) सिंचाई प्रणाली क्यारियों में व्यवस्थित कर दी जाती है|

खाद एवं उर्वरक

खाद एवं उर्वरकों के उपयोग का मुख्य उद्देश्य पौधों के समुचित विकास और बढ़वार के साथ ही मृदा में अनुकूल पोषण दशाएं बनाए रखना होता है| उर्वरकों को काम में लेने का उचित समय सामान्य तौर पर मृदा प्रकार, पोषक तत्व, जलवायु और फसल के स्वभाव पर निर्भर करता है| इनकी मात्रा, मृदा की उर्वरता तथा फसल को दी गई कार्बनिक खादों की मात्रा पर निर्भर करती है| यदि संतुलित मात्रा में खाद एवं उर्वरक दिए जाएं तो निश्चित रूप से पौधों की अच्छी बढ़वार और अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है|

अत: हमेशा मृदा जांच के उपरांत ही खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए| सामान्यतः खेत तैयार करते समय 10 से 12 टन कम्पोस्ट खाद, 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 किलोग्राम फॉस्फोरस व 25 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ की दर से डालनी चाहिए| इसमें फर्टिगेशन के रूप में एन पी के 19:19:19 की 25 ग्राम मात्रा प्रति वर्गमीटर की दर से सम्पूर्ण फसल चक्र में देनी चाहिए| यह मात्रा 15 दिनों के अंतराल पर 4 से 5 भागों में बांटकर देनी चाहिए| स्ट्रॉबेरी में सूक्ष्म पोषक तत्वों का छिड़काव भी उत्पादन बढ़ाने में सहायक होता है|

कीट

लगभग 200 से अधिक कीटों की प्रजातियां स्ट्रॉबेरी की फसल को सीधे या परोक्ष रूप से हमला करने के लिए जानी जाती है। ये कीटों में पतिंगे, मक्खियां, chafers, स्ट्रॉबेरी जड़ वीविल्स, झरबेरी एक प्रकार का कीड़ा, स्ट्रॉबेरी रस भृंग, स्ट्रॉबेरी मुकुट कीट, कण, aphids इत्यादि शामिल हैं।

रोग

स्ट्राबेरी के पौधे विभिन्न रोगों के शिकार हो सकते हैं। इसकी पत्तियां ख़स्ता फफूंदी, पत्ता स्पॉट (कवक Sphaerella fragariae द्वारा कारण), पत्ता ब्लाइट (कवक Phomopsis obscurans के कारण) से संक्रमित हो सकती हैं। शीर्ष एवं जड़ें red stele, verticillium wilt, black root rot एवं नेमाटोड्स के शिकार हो सकता है। फलों को ग्रे मोल्ड, rhizopus rot और leather rot से नुकसान हो सकता है। पौधों में सर्दियों के दौरान अत्यधिक तापमान बढ़ने से भी रोग विकसित हो सकते हैं। जब अपने स्ट्रॉबेरी के पौधों में पानी देते समय यह ध्याम रखें कि पानी पत्तों को नहीं जड़ों को ही दें अन्यथा पत्तियों पर नमी कवक के विकास को प्रोत्साहित करती है। सुनिश्चित करें कि स्ट्रॉबेरी एक खुले क्षेत्र में हो जिससे कि कवक रोगों का खतरा कम किया जा सके।

पैदावार

स्ट्रॉबेरी के फलों की उपज कई बातों पर निर्भर करती है| इनमें उगाई जाने वाली किस्म, जलवायु, मृदा, पौधों की संख्या, फसल प्रबंधन इत्यादि प्रमुख हैं| इसके प्रति पौधे से एक मौसम में 500 से 700 ग्राम फल प्राप्त किए जा सकते हैं| एक एकड़ क्षेत्रफल में 80 से 100 क्विटल फलों का उत्पादन हो जाता है| यह उत्पादन उपरोक्त वैज्ञानिक तकनीक और अच्छे फसल प्रबंधन से बढ़ाया भी जा सकता है|

अगर हम मिनिमम मूल्य 200 प्रति KG के हिसाब से गणना करेंगे, तो कुल कमाई होगी (8000 x 200 = 1600,000), सोलह लाख रुपये प्रति एकड़.

Published by UMESH KUMAR

15 Year agriculture professional experience, implemented lots of beneficial project to farmers, Currently working as AGRO CUNSULTANT by keeping aim in mind, to spread awareness to promote organic farming, improvement of crop yields, quality of the crops, also serving farmers related to vegetation growth and vegetation quality, agricultural crops, soil composition improvement, fertilizer utilization, crop disease control.

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